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पारस ब्लिस हॉस्पिटल की बाल चिकित्सा सर्जरी टीम ने बचाई एक असामयिक बच्चे के जान

पारस ब्लिस हॉस्पिटल की बाल चिकित्सा सर्जरी टीम ने बचाई एक असामयिक बच्चे के जान

पारस ब्लिस हॉस्पिटलमें डॉक्टर्स ने सभी मुश्किलों और बाधाओं के बावजूद एक ऐसे नवजात शिशु की जान बचाई जो कि ट्राईसिटी का पहला ऐसा बच्चा है जिसे (जन्म के समय ही सर्जीकल मालफार्मेशन सीडीएच (जन्मजात डायाफ्रागमेटिक हर्निया) होने का पता चला था

पंचकूला, 26 मई, 2018: पारस ब्लिस हॉस्पिटल, एमडीसी, पंचकूला में अपनी तरह की पहली ऐसी सर्जरी की गई है, जिसमें एक नवजात बच्चे को जन्म से ही जटिल मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा थाऔर उसे जन्म से ही डायाफ्रागमेटिक हर्निया था। अपनी तरह के इस पहले मामले में सफल सर्जरी के बाद नवजात शिशु, जो कि एक लड़का है, को इलाज के नौंवे दिन घर भेज दिया गया है। वह बच्चा जो पूर्ण अवधि पर जन्माथा, में कई तरह की जटिलताओं विकसित हो गई थीं, जिससे उसके जिससे फेफड़ों और दिल के कामकाज पर असर पड़ रहा था।

डॉ.सौरभ गोयल, कंसल्टेंट, नियोनटालॉजी, पारस ब्लिस हॉस्पिटल ने कहा कि ‘‘बच्चा एक सरकारी अस्पताल में पैदा हुआ था लेकिन वेंटिलेटर की अनुपलब्धता और जन्म के समय ही सर्जीकल कंडीशन का पता लगने पर उसे तुरंत सर्जीकल इंटरवेंशन की जरूरत थी। जन्म के दो घंटों के अंदर ही उसे पारस ब्लिस हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया गया था। सीडीएच (कॉन्गीनिटल डायाफ्रागमेटिक हर्निया) का निदान तुरंत सीएक्सआर पर किया गया था और वेंटीलेटर सपोर्ट से उसकी जान बचा ली गई।’’


यह बहुत जरूरी है कि इन बच्चों को जन्म के बाद बैग और मास्क वेंटिलेटर प्राप्त न हो क्योंकि इससे उनकी श्वसन समस्या और भी खराब हो सकती है और शुरुआत से बैग और ट्यूब वेंटिलेशन दिया जा सकता है। पारस ब्लिस  हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ.के.एल.राव, पीडियाट्रिक सर्जरी का कहना है कि सौभाग्य से बच्चे को जन्म के चार घंटे में वेंटिलेटर पर स्थानांतरित किया गया था और उसके स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण स्थिरता आने के बाद जन्म के 16 घंटे बाद उसकी सीएचडी सर्जरी की गई थी।

इसके अलावा डॉ.के.एल.राव, डायरेक्टर, पीडियाट्रिक सर्जरी, पारस ब्लिस हॉस्पिटल ने बताया कि बच्चे को प्रसव के समय से ही बाएं तरफ जन्मजात डायाफ्रागमेटिक हर्निया पाए जाने पर इलाज किया गया। डायाफ्रागमेटिक हर्निया एक जन्म दोष है जिसमें डायाफ्राम में असामान्य ओपनिंग होता है। डायाफ्राम छाती और पेट के बीच मांसपेशी है जो सांस लेने में मदद करता है और यह छाती और पेट के कंटेंट्स को अलग करता है। इसमें एक दोष से पेट के कंटेंट्स से छाती की तरफ हर्निया बढ़ता है और ये सांस लेने में कमी ला सकता है।

उन्होंने कहा कि ‘‘जैसे ही हमने चार घंटे के बच्चे को प्राप्त किया, जिसको सांस लेने में मुश्किल हो रही थी, हमने उसे वेंटिलेटर पर रखा और छाती के एक्स-रे के साथ बेसलाइन जांच प्राप्त की गई। बाल चिकित्सा सर्जरी परामर्श लिया गया और बच्चे को सर्जरी की सलाह दी गई।’’

डॉ.सौरभ गोयल, कंसल्टेंट नियोनटालॉजी, पारस ब्लिस हॉस्पिटल, ने बताया कि अन्य संबंधित प्रमुख जन्मजात दोषों का कोई लक्षण नहीं पाया गया। ऑपरेशन के दौरान पूरे पेट, आंतों का हिस्सा, यकृत के हिस्सों और पूरे स्पलीन को छाती में हर्निएटेड पाया जाता था जो फेफड़ों और दिल को दबा रहा था। इन सभी विषमताओं को पेट में वापस स्थानांतरित कर दिया गया था और दोष बंद कर दिया गया था, और बच्चे को एनआईसीयू में वेंटिलेटर पर वापस स्थानांतरित कर दिया गया था।

तीन दिनों के बाद बच्चे को वेंटिलेटर से हटा दिया गया और उसे न्यूनतम फीड शुरू हो गईं, जो बच्चे की सहनशीलता की क्षमता के आधार पर धीरे धीरे आगे बढ़ाई गई। आठवें दिन, बच्चे स्थिर फीड के साथ किसी भी ऑक्सीजन समर्थन के बिना पूर्ण फीड पर था। स्तनपान शुरू किया गया, बच्चे को नौवें दिन छुट्टी दी गई थी। उनके माता-पिता पंजाब के जिला बरनाला से हैं।

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