PRESS RELEASE

Apr 25, 2022

पारस एचएमआरआई हाॅस्पिटल में घुटना रिप्लेस करा चुके लोगों ने किया रैम्प वाॅक

पारस एचएमआरआई हाॅस्पिटल में घुटना रिप्लेस करा चुके लोगों ने किया रैम्प वाॅक
  • ‘‘फिट टू मूव’’ कार्यक्रम में आये घुटना रिप्लेस करा चुके महिला-पुरूषों ने कहा-अब घुटना रिप्लेसमेंट से डरने की जरूरत नहीं
  • हाॅस्पिटल के घुटना रिप्लेसमेंट विशेषज्ञ डाॅ. निषिकांत कुमार ने कहा-जीवन शैली में बदलाव, नित्य व्यायाम और धूप सेंकने को दिनचर्या बनाकर गठिया से बचा जा सकता है|

जो घुटने के दर्द से पेरषान थे और व्हील चेयर के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते थे। अपनी दिनचर्या करने में बिल्कुल असमर्थ थे। आज घुटने का रिप्लेसमेंट कराकर खुषहाल जिन्दगी जी रहे हैं। अब घुटने के रिप्लेसमेंट से डरने की जरूरत नहीं है। शनिवार को पारस एचएमआरआई सुपर स्पेषिलिटी हाॅस्पिटल में ‘‘फिट टू मूव’’ कार्यक्रम के तहत घुटने का रिप्लेसमेंट करा चुके 100 महिला-पुरूषों ने रैम्प वाॅक कर घुटने के दर्द से परेषान लोगों के मन से रिप्लेसमेंट का डर निकाल दिया।

पारस  हॉस्पिटल- ‘फिट टू मूव’’ कार्यक्रम

इस मौके पर पारस एचएमआरआई हाॅस्पिटल के घुटना रिप्लेसमेंट विषेषज्ञ डाॅ. निषिकांत कुमार ने बताया कि दो साल में 200 से अधिक लोगों के घुटने के रिप्लेसमेंट की सर्जरी की गयी। घुटने के दर्द से पीड़ित लोग पहले रिप्लेसमेंट कराने से डरते थे, लेकिन जब एक-दो लोगों के घुटने रिप्लेस किए गये और वह खुषहाल जिंदगी जीने लगे तब लोगों में रिप्लेसमेंट का डर खत्म हो गया। उन्होंने कहा कि दर्द में जीने से बेहतर है घुटना रिप्लेस करवाना। उन्होंने कहा कि कि हमने इस कार्यक्रम का आयोजन इसलिए किया है कि ताकि लोग देख सकें कि घुटना रिप्लेसमेंट के बाद लोग सामान्य जिन्दगी जी रहे हैं।

डाॅ. निषिकांत ने कहा कि पहले यह भ्रम था कि रिप्लेसमेंट करा चुके लोग जमीन पर पालथी मारकर नहीं बैठ सकते, लेकिन यह टूट चुका है। आज के दिनों में घुटना रिप्लेसमेंट कम्प्यूटर की मदद से की जाती है जिससे उसकी लाइफ ज्यादा होती है। यह इसलिए होता है कि कम्प्यूटर की मदद से एलाइनमेंट सही होता है। उन्होंने कहा कि गठिया के कारण घुटने में दिक्कत शुरू होती है। गठिया दो तरह की होती है इंफ्लामेट्री और नाॅन इंफ्लामेट्री। इंफ्लामेट्री जन्मजात है जो रोगी के खून में होता है। यह गठिया अगर शुरूआती दौर में पकड़ में आ जाये तो दवाई से ठीक हो सकती है। लेकिप नाॅन इंफ्लामेंट्री में रिप्लेसमेंट ही विकल्प है। उन्होंने कहा कि लोग घुटने के दर्द से राहत पाने के लिए दर्द निवारक दवा खाते हैं जिससे ट्यूमर हो सकता है, लीवर, किडनी और आंत खराब हो सकती है। इसलिए दर्द निवारक दवा नहीं खानी चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले तो गठिया 55 से 60 साल की उम्र के लोगों को होती है पर अब तो 30-35 साल के बच्चे-बच्चियों को हो जाती है। उन्होंने कहा कि शुरूआती दौर में लोग अगर नियमित व्यायाम करें, जीवन शैली में बदलाव लायें, जंक फूड नहीं खायें और सूर्य की रौषनी शरीर में लगाएं तो इसका अच्छा असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि शरीर का वजन उम्र के हिसाब से रखना चाहिए। अगर शरीर में एक किलोग्राम वजन बढ़ता है तो इसका 5 गुणा दबाव घुटने पर पड़ता है। पहले यह धारणा थी कि मोटे लोगों का घुटने का रिप्लेसमेंट नहीं होता है, लेकिन अब यह धारणा खत्म हो चुकी है।