Apr 25, 2022
गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन का सम्बंध बच्चे में एडीएचडी और ऑटिज्म से है रू पारस हॉस्पिटल गुडगाँव के प्रेगनेंसी विशेषज्ञों की टिप्पणी
गर्भावस्था के दौरान स्त्रीरोग विशेषज्ञध्ऑब्स्टेट्रीशियन से नियमित जांच कराना बेहद जरूरी होता हैए इस मामले में कोई भी लापरवाही नहीं होनी चाहिए। हर विजिट के दौरान रुटीन शारीरिक जांच में होने वाली माँ के ब्लड प्रेशर की जांच की जाती है। स्वास्थ्य देखभाल विशेषज्ञ पूरे गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर को स्वस्थ्य सीमा में रखने की सलाह देते हैं। स्वस्थ्य ब्लड प्रेशर सुरक्षित डिलिवरी और स्वस्थ्य बच्चा सुनिश्चित करता है।
गर्भावस्था में हाइपरटेंशन का पता लगाने के लिए ब्लड प्रेशर की जांच की जाती है। यह तब कंफर्म होता है जब सिस्टोलिक बीपी ≥ 140 एमएम एचजी और डायस्टोलिक बीपी ≥ 90 एमएम एचजी हो। इसे कंफर्म करने के लिए कम से कम 4.6 घंटे के अंतराल में दो बार जांच होना जरूरी है।
गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन को शारीरिक विकास के विभिन्न चरणोँ के हिसाब से वर्गीकृत किया गया है।
क्रॉनिक हाइपरटेंशन.गर्भावस्था के शुरुआती दिनोँ में अथवा भ्रूण के 20 हफ्ते का होने से पहले ब्लड प्रेशर का 140ध्90 एमएम एचजी अथवा इससे अधिक होना।
जेस्टेशनल हाइपरटेंशन.हाइपरटेंशन जो 20 हफ्ते के गर्भ के बाद पहली बार सामने आए और जिसमेँ प्रोटीन्युरिया न हो।
प्रीक्लेम्पसियाध्एक्लैम्पसिया. 20 हफ्ते के गर्भ के बाद हाइपरटेंशन और प्रोटीन्युरिया ≥ 300 एमजीध्24 घंटे होना।
हाइपरटेंशन से गर्भ में जटिलताएँ आती हैं और इससे बढते हुए भ्रूण पर भी खतरा रहता है। ऐसी महिलाएँ जिन्हेँ क्रॉनिक हाइपरटेंशन है उन्हेँ गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर का एक भी विजिट छोडना नहीं चाहिएए ताकि इस दौरान हाइपरटेंशन के सेकंडरी कारणोँ पर नजर रखी जा सकेए दवाएँ एडजस्ट की जा सकेँ और प्रीक्लेम्पसिया विकसित होने के खतरे के बारे में भी काउंसलिंग मिल सके।
एडवांसेज इन क्रॉनिक किडनी डिजीज 2015
गर्भावस्था में हाइपरटेंशन होने से प्लेसेंटा में रक्त संचार धीमा हो जाता है। अगर प्लेसेंटा कि भरपूर रक्त नहीं पहुंचता है तो गर्भस्थ शिशु को ऑक्सिजन कम मिलता है और उसे भरपूर पोषण नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप उसका विकास धीमी गति से होता है ;इंट्रायूटरीन ग्रोथ रेस्ट्रिक्शनद्धए जन्म के समय बच्चे का वजन कम होता है अथवा वह समय से पहले पैदा हो जाता है।
हाल के दिनोँ में बच्चोँ में न्युरोडेवेलपमेंट डिसॉर्डर के मामलोँ में बढोत्तरी के मामलेमेन मेडिकल विशेषज्ञ यह मानते हैं कि इसके लिए गर्भावस्था के दौराम महिलाओँ में हाइपरटेंशन की समस्या भी एक सम्भावित कारण हो सकता है।
कैलिफोर्निया यूएसए में हुए एक अध्ययन में यह स्पष्ट रूप से पता लगा है कि बच्चोँ में न्युरोडिवेलपमेंटल समस्याओँ के लिए माँ की मेटाबोलिक स्थिति जैसे कि डायबीटीजए हाइपरटेंशन और मोटापा काफी हद तक जिम्मेदार होता हैए जिसके परिणामस्वरूप बच्चोँ में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डरए विकास में देरी अथवा विकास के किसी खास हिस्से में कमी अथवा खामी होती है। ऐसा सम्भवतरू गर्भावस्था के दौरान माँ को हाइपरटेंशन और सम्बंधित प्रीक्लेम्पसिया होने के कारण भ्रूण को पर्याप्त ऑक्सिजन न मिल पाने के चलते होता है।
अमेरिकन अकैडेमी ऑफ पीडियाट्रिक्सए अप्रैल 2012
बच्चोँ में ऑटिज्म की पहचान सामाजिक संचार में कमीए संचार में अंतरऔर व्यवहार सम्बंधी रुकावट या बारम्बारता के रूप में होती है। हर 1000 बच्चोँ के जन्म पर एक में ऑटिज्म का असर हो सकता है। प्रेग्नेंसी से पहले का मोटापा गर्भावस्था में हाइपरटेंशन का कारण बन सकता है। रिसर्च यह बताते हैं कि प्रेग्नेंसी से पहले मोटापे की शिकार रही माँओँ के बच्चोँ में संज्ञानात्मक समस्या होनेऔर अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिव डिसॉर्डर के लक्षण बचपन में ही सामने आने का खतरा अधिक होता है। इतना ही नहींए इन बच्चोँ में किशोरावस्था के दौरान ईटिंग डिसॉर्डर और वयस्क होने पर साइकोटिक डिसॉर्डर होने का खतरा काफी ज्यादा रहता है।
इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ ओबेसिटीए 2011
यह जानना बेहद जरूरी है कि गर्भधारण से पहले और पूरे गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर को स्वस्थ्य सीमा में रखकर आप बच्चे का सम्पूर्ण विकास सुनिश्चित कर सकते हैंऔर गर्भ में जटिलताएँ होने से बच सकते हैं और जन्म के बाद बच्चे में न्युरोडिवेलपमेंट और देर से सीखने अथवा संज्ञानात्मक अपंगता जैसी समस्याओँ को आने से रोक सकते हैं। गायनेकॉलजिस्टध्ऑब्स्टेट्रीशियन से गर्भावस्था में नियमित जान्च बेहद जरूरी है। दवाओँ से हाइपरटेंशन का आवश्यक प्रबंधन अनिवार्य है। माँ और गर्भस्थ शिशुए दोनोँ के बेहतर स्वास्थ्य के लिए यह जरूरी है कि गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर को स्वस्थ्य सीमा में रखने के लिए अच्छा आहार और नियमित व्यायाम करेँ।