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Apr 25, 2022

पारस हॉस्पिटल गुडगांव में बची 23 साल की किडनी फेलियर की मरीज की जान, सास की किडनी से मिला नया जीवन

पारस हॉस्पिटल गुडगांव में बची 23 साल की किडनी फेलियर की मरीज की जान, सास की किडनी से मिला नया जीवन
  • जुलाई 2017 में जब पूजा यादव को अपना पहला गर्भ अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और किडनी की बीमारी के चलते गिराना पडा तब पूरा परिवार टूट सा गया था।
  • जीवित अथवा कैडेवर किडनी डोनर का भारत में बेहद अभाव होने की वजह से परिवार निराश हो गया था, ऐसे में पूजा का जीवन बचाने के लिए उनकी सास आगे आईँ। लेकिन उन दोनोँ का ब्लड ग्रुप अलग होने की वजह से डॉक्टरोँ के लिए यह मामला काफी चुनौती भरा था।

गुडगांव, 29 मई 2018: 23 साल की पूजा यादव को अपना पहला गर्भ अनियंत्रित ब्लड प्रेशर और किडनी फेलियर की वजह से गिराना पडा था।

उनके किडनी फेलियर के लिए हाइपरटेंशन को जिम्मेदार पाया गया और उनके मामले में किडनी ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचा था। लेकिन पूजा के लिए उपयुक्त डोनर मिलना सबसे बडी चुनौती थी। अंग दाताओँ की भीषण कमी के चलते कैडेवर किडनी मिलना एक स्वप्न जैसा था। किस्मत से, पूजा की सास आगे आईँ और पूजा की जान बचाने के लिए उन्होने अपनी किडनी डोनेट करने का फैसला किया। हालांकि डॉक्टरोँ के लिए यह मामला काफी कठिन था क्योंकि डोनर और रेसिपिएंट दोनोँ का ब्लड ग्रुप अलग था।पूजा का ब्लड ग्रुओ 0+ था जकि उनकी सास का ब्लड ग्रुप बी+ था।

पारस हॉस्पिटल, गुडगांव के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. पी. एन. गुप्ता ने बताया, “इस मामले में दो लोगोँ की जान दांव पर थी। यह एक चुनौतीपूर्ण सर्जरी थी जो चार घंटे तक चली। सबसे बडी चुनौती यह थी कि दोनोँ का ब्लड ग्रुप अलग था। चूंकि एक समान ब्लड ग्रुप वाले डोनर के इंतजार में बैठना कोई विकल्प नहीं था, ऐसे में हमने अलग ब्लड ग्रुप वाले उपलब्ध डोनर के साथ ही हमने सर्जरी करने का फैसला किया। काफी इलाज के बाद डोनर ब्लड ग्रुप के खिलाफ एंटीबॉडीज को खत्म किया गया और विशेषज्ञ सर्जंस की टीम के साथ ट्रांसप्लांट शुरू किया गयाऔर सर्जरी सफल रही। हमने डोनर और रेसिपिएंट दोनोँ को सर्जरी के बाद के इलाज को पूरी तरह से लेने और यह सुनिश्चित करने की सलाह दी कि दोनोँ दवाएँ नियमित रूप से लेँ। उन्हेँ किडनी के लिए उपयुक्त आहार लेने की भी सलाह दी गई। चूंकि हर कोई अपने आप में अलग होता है और ऐसे में हर किसी के पोषण की जरूरतेँ भी अलग होती हैं। मरीजोँ के लिए उपयुक्त मील प्लान बनाने के लिए हमने एक रीनल डायटीशियन से सलाह ली (ऐसा व्यक्ति जो किडनी की बीमारी में आहार तय करने के मामले में एक्सपर्ट हो)। भारत में किडनी फेलियर बेहद आम है, लेकिन पूजा की सर्जरी अलग थी क्योंकि उन्हेँ किडनी फेलियर की समस्या गर्भावस्था में हुई थी।“

अंतिम दौर की किडनी डिजीज तब होती है जब किडनी के कार्य करने की सामान्य क्षमता 90% तक कम हो जाती है। एक मरीज को दो तरह का इलाज मिल सकता है, डायलिसिस अथवा किडनी प्रत्यारोपण। डायलिसिस के बजाय किडनी ट्रांसप्लांट को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि इससे मरीज को बेहतर जीवन मिलता है, मृत्यु का खतरा कम होता है, खान-पान सम्बंधी परहेज कम होता है और इलाज का खर्च भी कम होता है।

इस मामले में डॉ. पी. एन. गुप्ता कहते हैं,किडनी की समस्या तब होती है जब किडनी अपनी फिल्टरिंग की क्षमता खो देती है और खतरनाक स्तर का तरल और कचरा शरीर में जमा होता रहता है, और ऐसे में ब्लड प्रेशर बढने से किडनी फेलियर हो जाता है। हाइपरटेंशन सबसे महत्वपूर्ण कारणोँ में से एक है जिसके चलते किडनी के ब्लड वेस्सेल्स डैमेज हो जाते हैंऔर उनकी सही ढंग से काम करने की क्षमता पर सर पडता है। जिस किडनी के ब्लड वेसेल्स डैमेज होते हैं वह शरीर से कचरा और अतिरिक्त तरल बाहर निकालना बंद कर देती है। ऐसे में आगे ब्लड प्रेशर बढता है तो खतरनाक साइकल बन जाता है।


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