Apr 25, 2022
पारस हॉस्पिटल में डॉक्टर मरीजोँ का जीवन बचाने के लिए कर रहे हैं सबसे आधुनिक और एफडीए अप्रूव्ड डिवाइस का इस्तेमाल
- पारस हॉस्पिटल गुडगांव के ने नई तकनीक की मदद से महेंदरगढ के एक 69 वर्षीय मरीज की जान बचाई, इस तकनीक को लेफ्ट आर्टियल अपेंडेज क्लोजर डिवाइस फॉर प्रोटेक्शन फ्रॉम स्ट्रोक के नाम से जानते हैं
- फ्ट आर्टियल अपेंडेज क्लोजर डिवाइस और डिवाइस फॉर प्रोटेक्शन फ्रॉम स्ट्रोक नाम की इस आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल कुछ खास प्रकार की दिल की बीमारियोँ के इलाज में भी किया जाता है
- पूरे भारत में अब तक एलएए क्लोजर डिवाइस के इस्तेमाल से सिर्फ 10 मामलोँ में इलाज किया गया है।
गुड्गांव, 25 मई 2018: सबसे आधुनिक तकनीक लेफ्ट एट्रियल अपेंडेज (एलएए) क्लोजर डिवाइस का इस्तेमाल करने वाले कुछ खास अस्पतालोँ की लीग में शामिल होते हुए पारस हॉस्पिटल, गुडगांव ने इस एफडीए अप्रूव्ड तकनीक से पहली सर्जरी की है।
हाल ही में, महेंदरगढ के रहने वाले 69 वर्षीय ओमप्रकाश सैनी का गुडगांव के अग्रणी हॉस्पिटल में सफल ऑपरेशन किया गया। यह हॉस्पिटल के लिए इस नए मिनिमली इनवेसिव प्रोसीजर के इस्तेमाल से इलाज का पहला केस है।
इस सर्जरी की अगुवाई करने वाले डॉ. अमित भूषण शर्माने की, जो कि हॉस्पिटल के इंटर्वेंशनल कार्डियोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर और यूनिट हेड हैं, ने इस सफलता के बारे में बताया कि, “भारत में अब तक इस तकनीस के इस्तेमाल से सिर्फ 10 लोगोँ की सर्जरी की गई है, और हमारा हॉस्पिटल गुड्गांव का दूसरा ऐसा हॉस्पिटल है जिसके पास यह सुविधा उपलब्ध है। एलएलए तकनीक से ऑपरेशन का तरीका मिनिमली इनवेसिव होता है, जिसका मतलब है कि सर्जरी की प्रक्रिया बेहद मामूली सा चीरा लगाकर पूरी की जाती है, और ऐसे में मरीज की रिकवरी बेहद तेज गति से होती है।“
आमतौर पर इस तकनीक का इस्तेमाल एट्रियल फिब्रिलेशन के मरीजोँ के इलाज के लिए किया जाता है, जिसे अनियमित धडकनोँ के रूप में पहचानते हैं। दिल की धडकनोँ का रिदम अनियमित होने का मतलब होता है कि दिल में खून का थक्का जमने सम्बंधी समस्या है। अध्ययनोँ में यह पाया गया है कि एट्रियल फिब्रिलेशन वाले ऐसे मरीज जिनमेँ खून का थक्का जमा होता है, उनमेँ से 95% लोगोँ में एलएलए हो सकता है।
दिल आमतौर पर चार चैम्बर में बटा होता है। ऐसे मामलोमें, बहुत सारे संवेग एक साथ शुरू होते हैं और दिल के ऊपरी दो चैम्बर अथवा एट्रिया के जरिए प्रवाहित होते हैं। ऊपरी चैम्बर के एंट्री प्वाइंट पर इन संवेगोँ की भीड एट्रिया में घर्षण को रोकती है, और फंसाव (ओम्प्लिकेशन) होने पर हृदय के निचले भाग में रक्त के प्रवाह में रुकावट आती है।
इस प्रक्रिया में रक्त एलएलए में जमा हो जाता है थक्का बन जाता है, और इसी के चलते स्ट्रोक होता है। एट्रियल फिब्रिलेशन से पीडित लोगोँ में सामान्य लोगोँ के तुलना में स्ट्रोक होने का खतरा 5-7 गुना अधिक रहता है।

“ऐसे मामलोँ में सबसे अहम होता है कार्डिएक स्ट्रोक से बचाव करना। ऐसे मरीजोँ को अक्सर खून को पतला करने वाली दवाएँ दी जाती हैं, जैसे कि वार्फरीन, जो कि एट्रियल फिब्रिलेशन के मरीजोँ में स्ट्रोक के खतरे को कम करती है, लेकिन वार्फरीन का इस्तेमाल करने वाले मरीजोँ में कई अन्य तरह की समस्याएँ भी सामने आती हैं। ऐसे में, एलएए क्लोजर डिवाइस एक बेहतर वैकल्पिक समाधान साबित होती है।“
वार्फरीन के इस्तेमाल से जो आम समस्याएँ सामने आती हैं, वे हैं: मरीज की इंटर्नेशनल नॉर्मल रेशियो (आईएनआर) का पता लगाने के लिए आर-बार रक्त लेना पडता है, अथवा क्लॉटिंग टाइम। वार्फरीन लेते समय, मरीज को कुछ खास खाने की चीजोँ पर नियंत्रण रखना पडता है, जिनमेँ विटामिन के होता है। वार्फरीन के इस्तेमाल से ब्लीडिंग का खतरा भी बढ जाता है। बहुत सारे मरीजोँ को वार्फरीन सूट नहीं करती है अथवा उनके लिए सामान्य आईएनआर मेंटेन कर पाना सम्भव नहीं होता है।
डॉ. भूषण शर्मा के अनुसार,“अगर मरीज को लेफ्ट एट्रियल/एलएए में खून का थक्का जमने का खतरा है तो डॉक्टर उन्हेँ उनके एलएए को सील करने के लिए एक प्रॉसीजर कराने की सलाह दे सकते हैं। इससे मरीज को स्ट्रोक होने का खतरा कम हो जाता है उन्हेँ खून को पतला करने वाली दवाएँ लेने की जरूरत नहीं पडती है।“